त्रिपिंडी श्राद्ध कब करें, त्रिपिंडी श्राद्ध के फायदे

त्रिपिंडी श्राद्ध कब करें (Tripindi Shraddha Kab Kare)? अगर आपकी कुंडली में पितृ दोष है तो, आपकी कुंडली में चाहे कितने भी अच्छे योग क्यों ना हों। आपका जीवन अत्यंत संघर्षमय और कष्ट पूर्ण हो जायेगा। धन हानि, संतान हीनता, नौकरी-व्यापार में असफलता, शुभ कार्यों में विलम्ब व पारिवारिक क्लेश बना रहता है।

त्रिपिंडी श्राद्ध कब करें (Tripindi Shraddha Kab Kare)

त्रिपिंडी श्राद्ध कब करें (Tripindi Shraddha Kab Kare)

त्रिपिंडी श्राद्ध क्या होता है?

सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार यह श्राद्ध, अपने कुल अथवा अज्ञात अतृप्त आत्माओं की मुक्ति हेतु किया जाता है। पितृगण जो सद्गति को प्राप्त न हुए या जिनको दुर्गति मिली तो, वो ऐसे ही भूमि, अंतरिक्ष एवं आकाश, तीनों स्थानों में भटकते रहते है, जब तक उनको मुक्ति नहीं मिलती और अपने कुल के लोगों को अदृश्य घोर कष्ट देने लगते है। तो उन पितरों की सद्गति हेतु व प्रेतत्व दूर कर उनकी आत्माओं को मुक्ति देने हेतु त्रिपिंडी श्राद्ध करने का विधान है।

त्रिपिंडी श्राद्ध का महत्व

सामान्यतः बड़े बुजुर्गों का देहांत होने के बाद हम उनका क्रियाकर्म, पिंडदान व श्राद्ध विधि विधान से कर देते हैं। परन्तु किसी बालक की मृत्यु होने पर यह सब नहीं करते, जिससे उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल पाती है। यही एक पूजा है जिससे आप बाल्यावस्था के लिए पिंडदान कर सकते हैं। त्रिपिंडी पूजा में होने वाले पिंडदान से बाल्य, तारुण्य व वृद्ध इन सभी आत्माओं को मुक्ति मिल जाती है। 

त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए कौन बैठ सकता है 

जिनकी कुंडली में दोष बताया गया हो उसे पूजा करनी चाहिए। चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित हो यह कोई भी कर सकता है, केवल अकेली कोई महिला यह पूजा नहीं कर सकती। सनातन धर्म में महिलाओं को पिंडदान करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। यह कार्य परिवार का कोई पुरुष ही कर सकता है। 

त्रिपिंडी श्राद्ध करने के फायदे 

इस श्राद्ध से तीन पीढ़ियों के पितृदोष का निवारण तथा पितरो को मुक्ति मिलती है पूजा समाप्ति के बाद पितरों का आशीर्वाद परिवार को मिलता है।  इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि घर में सुख शांति बनी रहती है, धन में वृद्धि होती है। तथा घर से बीमारियां दूर हो जाती है। गुणवान संतान की प्राप्ति होती है, अगर बच्चे बड़े हो तो उनकी शादी के योग बनने लगते हैं, परिवार में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती है, सपने में मरे हुए परिजन नहीं आते हैं, काम धंधे में बरकत होती है, पिंड दान पितृसेवा करने वालों को तीनो लोक में मान सम्मान मिलता है तथा खुद को भी मरने के बाद मुक्ति मिलती है। 

त्रिपिंडी श्राद्ध कब करें

त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा – ये तिथियां एवं संपूर्ण पितृपक्ष उचित होता है ।

अमावस्या को एक मास समाप्त होकर अगली तिथि को नया मास शुरू होता है। पितरों का एक दिन, मानव के एक मास (महिना) के बराबर होता है। अमावस्या को पितरों का भी दिन बदलता है इसलिये अमावस्या तिथि त्रिपिंडी श्राध्द के लिए उचित मानी जाती है। यह विधी केवल एक दिन में संपन्न होती है। परिवार में जब अत्याधिक संकटो का निर्माण हो तो त्रिपिंडी श्राद्ध विधि तत्काल करना उचित माना गया है। 

श्राद्ध के लिए निषेध काल

परिवार में मंगलकार्य के उपरांत अथवा अशुभ घटना के उपरांत एक वर्ष तक त्रिपिंडी श्राद्ध न करें । अत्यंत अपरिहार्य हो, उदाहरण के लिए – एक मंगलकार्य के उपरांत पुनः कुछ माह के अंतराल पर दूसरा मंगलकार्य नियोजित हो, तो दोनों के मध्यकाल में त्रिपिंडी श्राद्ध करें ।

गुरु शुक्रास्त, गणेशोत्सव एवं शारदीय नवरात्र की कालावधि में त्रिपिंडी श्राद्ध न करें।

श्राद्ध हेतु उचित स्थान

त्रिपिंडी श्राद्ध करने हेतु उचित स्थान –  त्र्यंबकेश्वर, गोकर्ण, महाबलेश्वर, गरुडेश्वर, हरिहरेश्वर (दक्षिण काशी), काशी-पिशाच मोचन (वाराणसी) 

यह भी पढ़े –

No. 20210906-Mon