श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का रहस्य, इतिहास और किंवदंतिया

श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग (Shri Kashi Vishwanath Jyotirling), श्री काशी विश्वनाथ 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग है, जिसका बहुत महत्व है। निराकार महेश्वर यहां भोलेनाथ श्री विश्वनाथ के रूप में विद्यमान हैं व इनके दर्शन मात्र से ही लोगों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग (Shri Kashi Vishwanath Jyotirling)

श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग (Shri Kashi Vishwanath Jyotirling)

ज्योतिर्लिंग का रहस्य

यह ज्योतिर्लिंग पवित्र नगरी काशी में स्थित हैं जो, कि काले चिकने पत्थर का है। जिस पर पंचामृत से अभिषेक कलश के द्वारा अभिषेक होता रहता है।

ऐसा कहा जाता है कि काशीक्षेत्र में मरने वाले किसी भी प्राणी को मोक्ष अवश्य ही प्राप्त होता है क्योंकि भगवान शिव मरते हुए प्राणियों के कानों में तारक मंत्र का उच्चारण करते हैं। जिससे घोर से घोर पापी की भी मुक्ति हो जाती हैं। पुराणों के अनुरूप इस नगर को मोक्ष नगरी का नाम दिया गया है।

ऐसी मान्यता है कि काशी, बाबा भोले के त्रिशूल पर टिकी हुयी है। प्रलय के समय भी इस नगरी का विनाश नहीं होगा। काशी तीनों लोकों में सबसे अच्छा शहर है, जो कि विश्व का सबसे पुराना जीवित शहर है। इसे आनंदवन, आनंदकानन, अविमुक्त क्षेत्र और काशी आदि कई नामों से जाना जाता है।

51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ मणिकर्णिका भी यहीं काशी में स्थित है। मीरघाट में विशालाक्षी शक्तिपीठ स्थित है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां देवी के दाहिने कान की मणि गिरी थी। तभी से इस स्थान का नाम मणिकर्णिका शक्तिपीठ पड़ा।

इस शहर के प्रसिद्ध घाट दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट हैं।

इतिहास

श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का कइयों बार जीर्णोद्धार किया गया, श्री विश्वनाथ मंदिर को मुगल सम्राट औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था और उस स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था, जो आज भी मौजूद है। जिसे ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जाना जाता है।

एक बार महारानी अहिल्या बाई के सपने में भगवान शिव आए। अहिल्या बाई शिव की अनन्य भक्त थीं। सपने में भोले को पाकर वह बहुत खुश हुई। फिर उन्होंने साल 1780 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।

महाराजा रणजीत सिंह ने सन 1853 में 1000 किलो सोने के साथ मंदिर के कलश को स्थापित किया था। शिखर पर सोने के कारण इसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है।

इस मंदिर के प्रांगण में स्वामी विवेकानंद जी, दयानंद सरस्वती जी, गोस्वामी तुलसीदास जी जैसे महान व्यक्ति पहुंचे हैं। यहीं पर संत एकनाथ जी ने वारकरी सम्प्रदाय के लिए, श्री एकनाथजी भागवत का ग्रंथ पूरा किया था।

गंगा नदी के घाटों के अलावा, शिवलिंग का बहुत महत्व है। सावन के महीने में भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का विशेष महत्व है।

किंवदंती

इस ज्योतिर्लिंग के बारे में एक कथा प्रचलित है। जो इस प्रकार है – भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ हिमालय पर्वत पर रहते थे। माता पार्वती ने आग्रह कर भगवान शिव को एक शांतिप्रिय स्थान और चुनने के लिए कहा, तब राजा दिवोदास की वाराणसी नगरी शिव को बहुत प्रिय लगी।

भगवान शिव के लिए इसे शांतिपूर्ण बनाने के लिए, निकुंभ नामक एक शिवगण ने वाराणसी शहर को निर्जन कर दिया। जिससे राजा दिवोदास अत्यंत दुखी हुए। और उन्होंने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और उनसे अपने दुःख का कारण बताया तथा निवारणार्थ राजा ने कहा की देवताओं को देवलोक को शोभयमान करना चाहिए, पृथ्वी लोक हम मनुष्यो हेतु है।

फिर ब्रह्मा जी के आग्रह करने पर भगवान शिव मंदराचल पर्वत की ओर चले गए, परन्तु अपने काशी मोह को त्याग न सके। भगवान विष्णु से शिव की यह व्याकुलता सही नहीं गयी, तब उन्होंने राजा को तपोवन में प्रस्थान करने का आदेश दिया। जिससे प्रसन्न काशी ने करवट लिया और शिव काशी के हो गए।

विश्वनाथ मंदिर, बी.एच.यू 

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू) के परिसर में एक विश्वनाथ मंदिर भी बनाया गया है। कहा जाता है कि पुराने विश्वनाथ मंदिर के कारण इस मंदिर का भी उतना ही महत्व है। इस नए मंदिर के बारे में एक कहानी है जो मदन मोहन मालवीय से संबंधित है। मालवीय जी शिव के उपासक थे। किसी समय जब उन्होंने भगवान शिव की पूजा की, तो उन्हें एक भव्य मूर्ति के दर्शन हुए।

जिससे उन्हें आदेश मिला कि बाबा विश्वनाथ की स्थापना की जाए। फिर उन्होंने वहां मंदिर बनवाना शुरू किया, लेकिन वह बीमार पड़ गए, फिर यह जानकर उद्योगपति युगल किशोर विरला ने इस मंदिर के निर्माण का काम पूरा किया। यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए भी आते हैं। विद्यालय परिसर में स्थित होने के कारण यह विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

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