महात्मा गांधी की जीवनी, जीवन परिचय और निबंध | Mahatma Gandhi Biography

महात्मा गांधी की जीवनी (Mahatma Gandhi Ki Jeevani), जीवन परिचय और निबंध, Mahatma Gandhi Biography in Hindi

मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें राष्ट्रपिता और बापू जैसे कई नामों से जाना जाता है, भारत के महान पुरोधा और राजनेता थे और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के महान क्रांतिकारी, जिन्होंने अपने विचारों से पूरी दुनिया में एक विशेष पहचान बनाई। अहिंसा, परमो धर्म और सत्य, जैसे शक्तिशाली विचारो से भारत को स्वतंत्रता और स्वराज्य प्राप्त करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, राष्ट्रपिता का दर्जा सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस ने गांधी को दिया था क्योंकि उनका मानना ​​​​था कि गांधीजी ने ही स्वतंत्रता आंदोलन को एक तरह से पुख़्ता दिशा दी थी।

महात्मा गांधी की जीवनी | Mahatma Gandhi Biography

महात्मा गांधी की जीवनी | Mahatma Gandhi Biography
पूरा नाम (Name)मोहनदास करमचंद गांधी (Mahatma Gandhi)
जन्म दिनांक (Birthday)2 अक्टूबर 1869 (Gandhi Jayanti)
जन्मस्थान (Birthplace)पोरबंदर (गुजरात)
पिता का नाम (Father Name)करमचंद गांधी
माता का नाम (Mother Name)पुतली बाई
शिक्षा (Education)1887 में मॅट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण।
1891 में बैरिस्टर (इंग्लैंड से) बनकर भारत लौटें।
विवाह (Wife Name)कस्तूरबा – Kasturba Gandhi
बच्चों के नाम (Childrens Name)हरिलाल, मणिलाल, रामदास, देवदास
उपलब्धियां (Award)भारत के राष्ट्रपिता, भारत के स्वतंत्रा संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान, भारत छोड़ो आंदोलन, असहयोग आंदोलन आदि।
महत्वपूर्ण कार्य (Work)सत्य और अहिंसा का प्रयोग करना सिखाया, छुआ-छूत जैसी घृणित बुराइयों को समाज से दूर करने का सफ़ल प्रयास किया।

गांधी जी ने भारत की आजादी की राह पक्की करने के लिए जीवन में कई अनावश्यक चीजों का त्याग किया था, उन्होंने ये सीख़ भगवद गीता, बाइबिल और बुद्ध चरित जैसी किताबों से प्राप्त किया, जिससे वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सत्य और त्याग सबसे महत्वपूर्ण धर्म है। गांधीजी अहिंसा के पुजारी थे, उनका मानना ​​था कि अगर कोई आपको एक गाल पर थप्पड़ मारे तो वह अपना दूसरा गाल उसके आगे रख दें, उनका मानना ​​था कि ऐसा करने से आपके विरोधी का दिमाग अक्सर बदल जाता है, उनका यह भी मानना था कि भले ही कोई आपके साथ नीच व्यवहार करता हो, फिर भी आपको उसके साथ सम्मान से पेश आना चाहिए।

विदेश में बैरिस्टर (वकालत) की शिक्षा प्राप्त करने के बाद, वे दक्षिण अफ्रीका में लंबे समय तक रहे, अपने काम के साथ-साथ उन्होंने कई सत्याग्रह आंदोलन भी किए और भारतीय प्रवासियों के अधिकारों के उल्लंघन को रोका तथा उन्हें सामाजिक और राजनीतिक अधिकार दिलाये।

महात्मा गांधी की जीवनी

गांधी का परिवार पोरबंदर से जुड़ा था, उनके दादा उत्तम चंद गांधी या ओता गांधी को किसी कारण से पोरबंदर जाना पड़ा और जूनागढ़ राज्य में शरण लेनी पड़ी, उत्तम चंद के पांचवें पुत्र करमचंद गांधी या कबा गांधी थे जो पोरबंदर में दीवान के पद पर कार्यरत थे। जिनका चार बार विवाह हुआ था, जिनमें से अंतिम पत्नी पुतलीबाई की एक बेटी और तीन बेटे थे, जिनमें से महात्मा गांधी अंतिम थे।

गांधी का प्रारंभिक जीवन

महात्मा गांधी का जन्म 02 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ था। उनका बचपन पोरबंदर में बीता, और वही से उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की, उनका स्कूली जीवन एक औसत छात्र का ही था, बचपन में वे पढ़ाई में इतने अच्छे नहीं थे। और बहुत ही शर्मीले स्वाभाव के थे।

सात साल की उम्र में, गांधी के पिता करमचंद को राजकोट के स्थानीय दरबार में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके बाद उनकी आगे की शिक्षा राजकोट में हुई। उन्होंने राजकोट से हाईस्कूल की परीक्षा पास की।

महात्मा गांधी की शादी बचपन में ही 13 साल की उम्र में हो गई थी। उनकी पत्नी का नाम कस्तूरबाई (कस्तूरबा गांधी) था, उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन स्वाभाविक रूप से सीधी, स्वतंत्र, मेहनती और बहुत कम बोलने वालो में से थीं। गांधी के अंदर देशभक्ति की चाह जगी थी, हालाँकि उन्हें बचपन में स्वराज शब्द का अर्थ भी नहीं पता था, लेकिन उन्हें पता था कि आज़ादी क्या है।

महात्मा गाधी का जन्म एक वैष्णव परिवार में हुआ था, उनके माता-पिता धर्म और पूजा के प्रति बहुत सक्रिय थे, हालाँकि गांधीजी को बचपन में पूजा पाठ में अधिक रूचि नहीं थी, लेकिन उनके शर्मीले व्यक्तित्व और भूतों के डर की वज़ह से  एक दासी के कहने पर राम नाम का जाप शुरू किया। दासी का, बचपन में बोया गया राम नाम का बीज उनको अंत तक काम आया और वह उनके पास रहा तथा उनका मन हमेशा राम नाम की भक्ति में ही लीन रहा।

मैट्रिक के बाद, उन्होंने आगे की शिक्षा के लिए भावनगर के शामलदास कॉलेज में प्रवेश लिया, लेकिन उनकी इच्छा वहां पड़ने की नहीं थी, अपने पिता के पुराने मित्र की सलाह पर, उन्होंने विदेश में आगे की पढ़ाई करने का फैसला किया, 16 साल की उम्र में उनके पिता करमचंद की मृत्यु हो गई। बीमारी के कारण मरे काबा गांधी का व्यक्तित्व  ईमानदार, सच्चे, उदार लेकिन गुस्सैल व्यक्ति का था। माँ एक घरेलु तथा आध्यात्मिक प्रवृति की महिला थीं।

महात्मा गांधी की लन्दन में शिक्षा और वापसी

आगे की पढ़ाई के लिए,  मोहनदास 1888 में मुंबई बंदरगाह से लंदन के लिए रवाना हुए। वहां जाने के बाद शुरू में उन्हें, अंग्रेजी भाषा की अधिक समझ न होने और भोजन में मांस मदिरा न खाने की माँ की हिदायत की वजह से कई दिनों तक भूखा और परेशान रहना पड़ा। काफी दूर पर उन्हें शाकाहारी भोजन की व्यवस्था मिली। यहाँ तक की बुनियादी जरूरतों के लिए भी भाषा की कम समझ की वज़ह से बहुत परेशानी उठानी पड़ी। 

विदेश में रहते हुए उन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा सीखा, फ्रेंच यूरोप की राष्ट्रीय भाषा थी, इसलिए आम बोलचाल में वहां इसका इस्तेमाल किया जाता था, और अपनी बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी की।

उन्होंने एक विदेशी दोस्त के कहने पर भगवद गीता का पाठ किया, जिसका उन पर बहुत ही उत्कृष्ट प्रभाव पड़ा और भगवत गीता उनके लिए सबसे अच्छी मार्गदर्शक पुस्तक बन गयी।

इसके अलावा, उन्होंने अर्नोल्ड की बुद्ध चरित “द लाइट ऑफ एशिया” पढ़ी, जिसके बाद उनकी रुचि धर्म और भारतीय संस्कृति में हो गई। जिससे वह बहुत प्रभावित हुए और उन्हें पता चला कि त्याग ही वास्तविक धर्म है।

10 जून 1891 को गांधी बैरिस्टर की परीक्षा पास कर बैरिस्टर कहलाए और भारत लौट आए। 

अफ्रीका की यात्रा

महात्मा गांधी को अपनी वकालत के दौरान दादा अब्दुल्ला और अब्दुल्ला नामक एक मुस्लिम व्यापारिक संस्था के मुकदमे के संदर्भ में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करनी पड़ी थी। इस यात्रा के दौरान गांधीजी को भेदभाव और रंगभेद का सामना करना पड़ा। आपको बता दें कि गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में सफल होने वाले पहले भारतीय मानव थे जिन्हें अपमानजनक तरीके से ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था।

यहां उनके साथ भी अश्वेत नीति के तहत बहुत बुरा व्यवहार किया गया। जिसके बाद गांधी जी के धैर्य की सीमा टूट गई और उन्होंने इस रंगभेद के खिलाफ लड़ने का फैसला किया।

जब गांधीजी ने रंगभेद के खिलाफ लड़ने का संकल्प लिया, रंगभेद के अत्याचारों के खिलाफ, गांधी ने यहां रहने वाले प्रवासी भारतीयों के साथ 1894 में नटाल इंडियन कांग्रेस का गठन किया और इंडियन ओपिनियन अखबार निकालना शुरू किया।

इसके बाद 1906 में दक्षिण अफ्रीकी भारतीयों के लिए अवज्ञा आंदोलन शुरू किया गया, इस आंदोलन को सत्याग्रह का नाम दिया गया।

उन्होंने अपने जीवन के मूल्यवान 21 वर्ष अफ्रीका में बिताए, जहां उन्होंने गहरा राजनीतिक, कानूनी और नेतृत्व का अनुभव प्राप्त किया।

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शक्ति शारीरिक क्षमता से नहीं आती है, यह एक अदम्य इच्छा शक्ति से आती है – 

महात्मा गांधी

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भारत में गांधी के प्रमुख आंदोलन

वैसे गांधी जी ने कई आंदोलन किए, उन्होंने जीवन भर किसानों, मजदूरों और अन्य वर्गों के लिए कई आंदोलन किए, जिनमें से कई प्रमुख आंदोलनों की सूची इस प्रकार है –

  • चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा सत्याग्रह (1917 से 1918)
  • खिलाफत आंदोलन (1919 में)
  • असहयोग आंदोलन (1920 से 1922)
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी मार्च (1930 में)
  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942 में)

चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में गांधी का सत्याग्रह

1917 से 1918 तक गांधीजी ने तीन मुख्य सत्याग्रह आंदोलन किए, जिसके दौरान उन्हें अपार सफलता मिली, जिसमें उन्होंने चंपारण (बिहार), अहमदाबाद और खेड़ा (गुजरात) में आंदोलन किए, जो उन स्थानों के नाम पर थे।

सबसे पहले, चंपारण का सत्याग्रह आंदोलन, जिसके लिए गांधी जी शुरू में तैयार नहीं थे, लेकिन राजकुमार शुक्ल के बार-बार कहने के बाद, वे आखिरकार चंपारण में आंदोलन करने के लिए सहमत हुए, चंपारण जो कि बिहार में है, जहां तिनकठिया का नियम अंग्रेजों ने लगा रखा था, जिसके दौरान किसानों के लिए अपने 3/20 हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य कर दिया गया था, इससे किसानों को बहुत नुकसान हो रहा था।

फिर गांधीजी ने चंपारण में सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया जिसे चंपारण आंदोलन के रूप में भी जाना जाता है, उन्होंने बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन किया और अंग्रेजों को आश्वस्त कर अपनी बात रख कर उसको मनवाया और आंदोलन में सफलता पायी।

अहमदाबाद में मिल मजदूरों और मालिकों के बीच बोनस को लेकर गहन विवाद हो रहा था, जिसके समाधान के लिए मजदूरों ने गांधीजी से मदद की गुहार लगाई और गांधीजी इसके लिए राजी हो गए।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान महंगाई बढ़ गई थी, लेकिन मिल मजदूरों की मजदूरी नहीं बढ़ी थी और मजदूरों को बोनस भी नहीं दिया जा रहा था। फिर एक छोटे से अनशन के बाद गांधीजी को सफलता मिली और मिल मजदूरों को उनका हक मिला। पहले से मिल रहे बोनस, जो की मिल मालिको के लिए अधिक राशि थी, से भी अधिक दिलवाया।

खेड़ा में फसल नष्ट होने के बाद भी अंग्रेजों द्वारा जबरन किसानों से कर वसूल किया जा रहा था, जो गांधीजी को पसंद नहीं आया और उन्होंने सरकार के कर वसूलने के नियमों की अवहेलना करने का फैसला किया और उस आंदोलन में सफल भी हुए।

उपरोक्त तीन आंदोलनों ने गांधी जी को एक विशेष पहचान दी और अब वे भारत के लोगों की नजर में एक सम्मानित व्यक्ति बन गए थे तथा गांधी जी देश के लोगों के दिल के करीब आ गए थे।

खिलाफत आंदोलन

खिलाफत आंदोलन एक मुस्लिम बहुल आंदोलन था, जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के ख़लीफ़ा  का प्रभुत्व कमजोर हो रहा था, तब भारत से आल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस, खलीफा का समर्थन करना चाहता था।

इसके लिए मुस्लिम समुदाय के लोगो ने गांधीजी से खिलाफत आंदोलन  को व्यापक रूप से फैलाने और आंदोलन का समर्थन करने का आग्रह किया।

इसने गांधी को मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी जगह बनाने का मौका दिया, इस आंदोलन के माध्यम से गांधीजी ने सभी मुसलमानों से अनुरोध किया कि वे अपने सभी सम्मान और पदक अंग्रेजों को वापस कर दें और ब्रिटिश सरकार का विरोध करें।

गांधी का असहयोग आंदोलन

देश की जनता के सहयोग के बिना किसी भी सरकार का काम कर पाना असंभव है, जब भारत में रॉलेट एक्ट पारित हुआ, तो लोगों में बहुत आक्रोश था। ब्रिटिश सरकार के बहिष्कार की बात चल रही थी, उस समय पंजाब के जलियांवाला बाग में एक शांति सभा का आयोजन किया गया था, जिस पर अंग्रेजों ने गोलियां चलाईं और कई लोगों की जान चली गई।

बापू ने 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू किया, जिसका मूल उद्देश्य बिना किसी हिंसा के ब्रिटिश सरकार का बहिष्कार करना था।

गांधीजी और लोगों का मानना ​​था कि ब्रिटिश सरकार हम पर शासन इसलिए कर पा रही है क्योंकि उन्हें भारतीयों का समर्थन मिल रहा है, इसलिए उनका मानना ​​था कि अगर बिना किसी हिंसा के ब्रिटिश सरकार का सहयोग बंद कर दिया गया, तो हमें आजादी मिलेगी, बस क्या था।

इस आंदोलन के दौरान लोगों ने सक्रिय भाग लेना शुरू कर दिया, लोगों ने सरकारी कार्यालयों से इस्तीफा दे दिया, बच्चों ने अंग्रेजी स्कूल से अपना नाम काटवा लिया और अंग्रेजी कपड़ों का बहिष्कार किया और खादी के कपड़े पहनने लगे।

आंदोलन बहुत शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था कि अचानक पता चला कि उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा नामक इलाके में जन आंदोलन हिंसक हो गया है, जहां कुछ लोगों ने एक पुलिस मुख्यालय में आग लगा दी, जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसक कार्रवाई से गांधीजी को गहरा दुख पहुंचा और 1922 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।

गांधी जी का सविनय अवज्ञा आन्दोलन

यह आंदोलन गांधीजी का एक और महत्वपूर्ण आंदोलन था, जो असहयोग आंदोलन के कई साल बाद शुरू हुआ था।

12 मार्च 1930 को गांधी जी और उनके आश्रम के 78 अन्य साथियों ने साबरमती आश्रम से दूर दांडी गाँव की ओर पैदल यात्रा निकाली, जहाँ गांधी ठीक 6अप्रैल 1930 को दांडी गाँव पहुँचे, उन्होंने अपनी मुट्ठी में समुद्र के पानी के वाष्पीकरण से बने नमक को उठाकर सरकार के आदेशों की अवज्ञा की।

लगभग 24 दिनों तक चली इस यात्रा में हजारों की संख्या में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और बिना कोई टैक्स दिए नमक का उत्पादन कर इस यात्रा को गांधी जी ने सफल बनाया।

इस आंदोलन में 70 हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

उसी समय, भारतीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी, उन्होंने कांग्रेस में गांधी के अहिंसक सत्याग्रह आंदोलन के उद्देश्य को समायोजित किया और उनके नेतृत्व में, कई आंदोलनों और बैठकों की, अंततः अंग्रेजों को अपने घुटनों पर आने के लिए मजबूर होना पड़ा। और सविनय अवज्ञा आंदोलन सफल रहा।

सविनय अवज्ञा की लोकप्रियता को देखकर ब्रिटिश सरकार डर गई और इस तूफान को रोकने के लिए उसने 5 मार्च 1931 को गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता किया जिसे गांधी-इरविन पैक्ट कहा जाता है।

इस राजनीतिक समझौते के तहत सविनय अवज्ञा आंदोलन को सशर्त समाप्त कर दिया गया था, जिसमें ब्रिटिश सरकार को उन सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करना था जिनके खिलाफ हिंसा का कोई अपराध नहीं था।

भारत छोड़ो आंदोलन

भारत छोड़ो आंदोलन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शुरू किया गया था, हालांकि यह युद्ध विश्व स्तर पर हो रहा था, लेकिन यह भारत की आजादी के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। जहां अंग्रेजो की दमनकारी नीतिया लोगों का शोषण कर रही थी और दूसरी ओर वह विश्व युद्ध के लिए भारतीयों का इस्तेमाल भी कर रही थी।

इस समय गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन की मांग की थी और गांधीजी ने भारत के लोगों से अंग्रेजों को कोई भी सहयोग नहीं देने की मांग की, क्योंकि यही उचित समय था जब अंग्रेजों पर दबाव डालकर अपनी बातों को मनवाया जा सकता  जाता था।

गांधीजी ने अंग्रेजों को एक संकेत दिया था कि भारत के लोग युद्ध में सहयोग करेंगे, केवल यह सुनिश्चित किया जाये कि युद्ध के बाद ब्रिटिश, भारत से चले जाएंगे और भारत में पूर्ण स्वराज होगा।

क्योंकि किसी बड़े आंदोलन को करने में समय अधिक लग जाता था और उसमे लोगो का उत्साह, आंदोलन के सफ़ल होने तक, समय के साथ कम पड़ जाता था। परन्तु भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए बापू ने लोगों से करो या मरो का आह्वाहन किया।

इस आंदोलन का फायदा यह हुआ कि दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति तक अंग्रेजों को समझ आ गया था कि अब भारत जग चुका है, फिर अंग्रेजों ने देश को अपनी सत्ता सौंप दी। और इस तरह भारत अंग्रेजों की ग़ुलामी से आज़ाद हुआ।

गांधी की मृत्यु

30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या कर दी गई थी। बापू को नाथूराम गोडसे, नामक एक आदमी ने गोलियों से भूनकर मार डाला था, हालांकि नाथूराम गोडसे को बाद में अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन गांधी की मौत देश के लिए एकअपूरणीय क्षति थी। जिसकी भरपाई असम्भव थी असंभव है और असंभव ही रहेगी।

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